***मूक्तक***
कोमल घास पर चलकर घाव दुसरो को दे जाते है मिष्ठान खाते खुद जहर की पुड़िया हाथ दे जाते है
हया नही आती जालिमो को अपनी हरकत पर
मासूम प्यारी बेटियों का वो बचपन छीन जाते है
*** कविता***
सुचिता के हत्यारो को
ढूंढकर मारो सालो को ,
सर-ए-आम फांसी लटकादो
उन मानवता के गद्दारो को।
अरे ! सुचिता के ....
नोंच नोंच मारा जिसने
नन्ही प्यारी गुड़िया को,
अरे उन कुत्तो को हाथ धरो
तुम उन सैनिक मतवालों को।
अरे ! सुचिता के ...
जिसने कुचला उस बगीया के
नन्हे प्यारे फूल को,
भरे बाजर जिंदा जला दो
उन बलात्कारी हैवानो को।
अरे ! सुचिता के ....
अरे बहुत हो गई माफी-
वाफी इसको अब बन्द करो,
लटकाकर फाँसी इनको
तुम इनके पक्षधरो से द्धंद्ध करो ।
अरे ! सुचिता के ....
कवि-रणवीर सिंह चारण
गांव भदौरा, जिला नागौर, राजस्थान
(हॉल-पिपाड़ शहर जौधपूर)
मौ.9680745147
No comments:
Post a Comment