Sunday, 21 October 2018

तुमने क्यौ श्रृंगार से....

ना बिदिया कुमकुम ना पायल ना हाथौ में चुडिया ।
तुमने क्यौ श्रृंगार इतनी से बना रखी है दूरिया ।।

ना जाने किन-किन प्रशनों के उतर खोजा करती हौ ।
अन्तर मन में मन्थन करती क्या- क्या सोचा करती हौ ।
तो बता नही देती क्यौ मुझको क्या है यह मजबूरीया ।।

                                     तुमने क्यौ श्रृंगार से....

रूप का आकर्षण क्षण छण में मन अभिमत्रिंत कर देता था ।
हृदय पतल पर छवि तुम्हारी रेखाकिंत कर देता था ।
मेहगे मोती सी काया पर, काया पर मेहगे मोती सी ।
मेहगे मोती सी काया पर,धाक रखी क्यों सिपिया ।।

                                    तुमने क्यौ श्रृंगार से....

हुआ बदन पर हवन पति तेरा तु कहाँ अभागिन है ।
में मर कर हो गया अमर तौ तू भी सदा सूहागन है ।
तू मुझको चांद समझ लेना तु मिट जाएगी दुरिया ।।

                                   तुमने क्यौ श्रृंगार से....
कवि-रणवीर सिंह चारण
भदौरा, नागौर, राजस्थान
मौ. 9680745147

में भारत माँ का बेटा हूँ

जुबान कड़वी है मगर दिल साफ रखता हूं
सही को सही और गलत को गलत कहने की औकात रखता हूं
दोस्त हो या दुश्मन मेरा मैं सभी के कदमों का इलाज रखता हूं
और मैं अपनी शख्सियत की यह पहचान रखता हूं
आंखों में तिरंगा और दिल में हिंदुस्तान रखता हूं।।
             कवि-रणवीर चारण
        भदौरा, नागौर, राजस्थान
          मौ. 9680745147